Bhagavad Gita: अध्याय 2, श्लोक 16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: |
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: || 16||

न–नहीं; असतः-अस्थायी का; विद्यते-वहां है; भावः-सत्ता है; न कभी नहीं; अभावः-अन्त; विद्यते-वहाँ है; सतः-शाश्वत का; अभ्यो:-दोनों का; अपि-भी; दृष्ट:-देखा गया; अन्तः-निष्कर्ष; तु–निस्सन्देह; अनयोः-इनका; तत्त्व-सत्य के; दर्शिभिः-तत्त्वदर्शियों द्वारा।

अनुवाद

BG 2.16: अनित्य शरीर का चिरस्थायित्व नहीं है और शाश्वत आत्मा का कभी अन्त नहीं होता है। तत्त्वदर्शियों द्वारा भी इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन करने के पश्चात् निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर इस की पुष्टि की गई है।

भाष्य

श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार संसार में तीन तत्त्वों का अस्तित्व है 

भोता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ।।(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.12) 

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः।(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.10)

संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यताव्यक्तं भरते विश्वमीशः।(श्वेताश्वतरोपनिषद्-1.08) 

ये सभी वेद मंत्र बताते हैं कि भगवान, जीवात्मा और माया तीनों नित्य तत्त्व हैं।

1. भगवान नित्य हैं इसलिए वे सत् (शाश्वत तत्त्व) हैं। वेदों में भगवान को सत्-चित्-आनन्द (नित्य-सर्वज्ञ-आनंद का महासागर) कहा गया है। 2. आत्मा अनश्वर है और इसलिए सत् है। शरीर का एक दिन नाश होगा इसलिए इसे असत् (अस्थायी) कहा गया है आत्मा भी सत्-चित्-आनन्द है किन्तु अणु रूप में है। अतः आत्मा अणु सत्, अणु चित् और अणु आनन्दमय है। 3. माया तत्त्व जिससे संसार निर्मित है, नित्य या सत् है। फिर भी सभी भौतिक पदार्थ जिन्हें हम अपने आस-पास देखते हैं, का सीमित अस्तित्व है तथा इन सबका समय के साथ विनाश हो जाता है। इसलिए इन्हें असत् या अस्थायी की श्रेणी में रख सकते हैं। इस प्रकार संसार ही असत् है क्योंकि इसका अस्तित्व केवल माया तत्त्व के कारण है जो कि सत् है। 

जब हम संसार को असत् कहते हैं तब इसे मिथ्या कहने की भूल नहीं करनी चाहिए। असत् का अर्थ मिथ्या अर्थात् अस्तित्वहीन नहीं है। कुछ तत्त्वदर्शी यह दावा करते हैं कि संसार मिथ्या है। वे दृढ़ता से कहते हैं कि यह केवल हमारी अज्ञानता है कि हम संसार का अनुभव करते हैं और एक बार जब हम ब्रह्म-ज्ञान में स्थित हो जाते हैं तब संसार के अस्तित्व का अनुभव समाप्त हो जाता है। यदि यह सत्य होता तब फिर इसके पश्चात् भागवत्प्राप्त संतो के लिए संसार नहीं रहना चाहिए क्योंकि उनकी अज्ञानता नष्ट हो चुकी होती और उनके लिए संसार का अस्तित्व समाप्त हो गया होता। ऐसी स्थिति में ब्रह्मज्ञान की अवस्था प्राप्त करने के पश्चात् ऐसे संत धार्मिक ग्रंथों की रचना कैसे करते और धार्मिक ग्रथों की रचना करने के लिए उन्हें कागज और कलम कहाँ से मिलती? 

सत्य यह है कि ब्रह्मज्ञानी भी संसार की वस्तुओं का प्रयोग कर यह सिद्ध करते हैं कि संसार का अस्तित्व उनके लिए भी है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मज्ञानी को अपने शरीर के पोषण हेतु भोजन की आवश्यकता भी होती है। 

वैदिक ग्रंथों में इस प्रकार से वर्णन किया गया है- 'पैशवादिभिश्चाविशेषत' अर्थात् 'ब्रह्मज्ञानी संतों को भी वैसे ही भूख लगती है जैसे कि पशुओं को।' यदि इनके लिए संसार का कोई अस्तित्व नहीं है तब उन्हें कैसे और क्यों भोजन ग्रहण करने की आवश्यकता पड़ती है? । इसके अतिरिक्त तैत्तिरीयोपनिषद् यह अवगत कराता है कि भगवान सर्वव्यापक है:

सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा

इदँ सर्वमसृजत यदिदं किं च। तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्। 

तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्। निरुतं चानिरुतं च। निलयनं 

चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं चा सत्यमभवत्। 

यदिदं किं च। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति।

(तैत्तिरीयोपनिषद्-2.6.4)

यह वैदिक मंत्र यह बताता है कि भगवान केवल सृष्टि का सृजन नहीं करते बल्कि वह स्वयं प्रत्येक अणु में व्याप्त हो जाते हैं। इसलिए यदि भगवान इस संसार में सर्वव्यापक हैं तब फिर संसार का अस्तित्व क्यों नहीं हो सकता? इस प्रकार संसार को मिथ्या कहना और संसार में भगवान को सर्वव्यापक कहने के तथ्य का विरोधाभास है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह व्याख्या करते हैं कि संसार का अस्तित्व है किन्तु यह नश्वर है, इसलिए वे इसे 'असत्' या 'अस्थायी' कहते हैं। उन्होंने संसार को 'मिथ्या' या 'अस्तित्वहीन' नहीं कहा है।

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